आज जहन्नुम बना सँसार सारा जल रहा है मौत ताँडव कर रही है, उस क्रूरता की आँच देखो जैसे उलट रही है काइनात सारी पलट रहा है समुद्र आग का आदम की बस्तियाँ जायेंगी उजड, आशियानों पर गिरी कैसे देखो बिजलियाँ बाग की हर शाख जलती रही बागबाँ मायूस है नर्म, नाजुक सी वो कलियाँ आतिशों में झुलस रही॥ ऐ जवानो ! तुम बचालो बरबादी के इस अणू से आबादियों को आतिशों से उठ के आगे तुम बढो, करलो सामना तूफान का करो कुछ काम ऐसा अमन और शोहरत से मिलो॥ जिँदगी की वादियों में घिर के कुछ देखो वहाँ केसे इतिहासों में घुटती फिर रही इन्सानियत है? कैसे घुट घुट कर है जीती जीते जी आबादियाँ॥ चलो बढो अब आगे आओ सामने मँजिल है खडी अपनी बाहें फैलाकर यूँ अपने अपने कदम बढाओ फूँक दो तुम जान उन मुर्दों रूहों में जोश से, पर होश में वीरो चलो आगे बढो अपने इन फौलादी हाथों से मुशकिलों को तोड दो आके अपने जोश से इनमें नई इक जान फूँक दो॥ निजात दे दो इन्सानियत को जीने लगे उजडे रेगिस्तान जहाँ होंठ नहा उठे शबनम से कलियाँ खिल उठे खाक का हर एक जर्रा बन जाये ज्यों आफताब॥
आप यूं फासलों से गुज़रते रहे
ReplyDeleteदिल से कदमों की आवाज़ आती रही
आहटों से अंधेरे चमकते रहे
रात आती रही रात जाती रही
गुनगुनाती रहीं मेरी तन्हाईयां
दूर बजती रहीं कितनी शहनाईयां
जिंदगी जिंदगी को बुलाती रही
क़तरा-क़तरा पिघलता रहा आसमां
रूह की वादियों में जाने कहां
इक नदी दिलरूबा गीत गाती रही
आप की गर्म बांहों में खो जाएंगे
आप के नर्म ज़ानों पे सो जायेंगे
मुद्दतों रात नींदें चुराती रही
आप यूं फ़ासलों से गुज़रते रहे ।।
Posted by Lalit Jain at 10:55 PM 0 comments
Labels: आप लता जी की आवाज़ में सुनिए ये गीत
सियासत
आज जहन्नुम बना
सँसार सारा जल रहा है
मौत ताँडव कर रही है, उस
क्रूरता की आँच देखो
जैसे
उलट रही है काइनात सारी
पलट रहा है समुद्र आग का
आदम की बस्तियाँ जायेंगी उजड,
आशियानों पर गिरी
कैसे देखो बिजलियाँ
बाग की हर शाख जलती रही
बागबाँ मायूस है
नर्म, नाजुक सी वो कलियाँ
आतिशों में झुलस रही॥
ऐ जवानो ! तुम बचालो
बरबादी के इस अणू से
आबादियों को आतिशों से
उठ के आगे तुम बढो, करलो
सामना तूफान का
करो कुछ काम ऐसा
अमन और शोहरत से मिलो॥
जिँदगी की वादियों में
घिर के कुछ देखो वहाँ
केसे इतिहासों में घुटती
फिर रही इन्सानियत है?
कैसे घुट घुट कर है जीती
जीते जी आबादियाँ॥
चलो बढो अब आगे आओ
सामने मँजिल है खडी
अपनी बाहें फैलाकर यूँ
अपने अपने कदम बढाओ
फूँक दो तुम जान
उन मुर्दों रूहों में
जोश से, पर होश में
वीरो चलो आगे बढो
अपने इन फौलादी हाथों से
मुशकिलों को तोड दो
आके अपने जोश से इनमें
नई इक जान फूँक दो॥
निजात दे दो इन्सानियत को
जीने लगे उजडे रेगिस्तान
जहाँ
होंठ नहा उठे शबनम से
कलियाँ खिल उठे
खाक का हर एक जर्रा
बन जाये ज्यों आफताब॥
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SUDHIR SHARMA